खटीमा में वन विभाग विवाद गहराया: थारू समाज पर उत्पीड़न के आरोप, तस्करी पर चुप्पी से नाराजगी

सीमांत खटीमा में वन विभाग पर उठे गंभीर आरोप

उत्तराखंड के खटीमा क्षेत्र से वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर चिंताजनक खबर सामने आई है। थारू जनजाति के लोगों ने वन कर्मियों पर शोषण, अभद्र व्यवहार और अधिकारों के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी दावों के विपरीत जमीनी स्तर पर जनजातीय समाज को परेशान किया जा रहा है। इससे क्षेत्र में आक्रोश का माहौल बन गया है।


अंतिम संस्कार तक पर वसूली के आरोप

ग्रामीणों के अनुसार, हालात इतने खराब हैं कि दाह संस्कार जैसे संवेदनशील कार्य के लिए भी सूखी लकड़ी लेने पर पैसे मांगे जा रहे हैं।

गरीब परिवार, जो साइकिल से लकड़ी ढोकर अपनी आजीविका चलाते हैं, उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है। कई मामलों में उन पर झूठे मुकदमे दर्ज करने के आरोप भी सामने आए हैं।


तस्करों को संरक्षण देने के आरोप

जहां एक ओर स्थानीय लोगों पर कार्रवाई की जा रही है, वहीं दूसरी ओर बड़े लकड़ी तस्करों को संरक्षण मिलने के आरोप लगे हैं।

ग्रामीणों का दावा है कि कुछ वन अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से दूर रहकर पर्दे के पीछे से तस्करी को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे पूरे सिस्टम पर सवाल उठ रहे हैं।


विपिन सिंह राणा प्रकरण से भड़का आक्रोश

हाल ही में विपिन सिंह राणा के साथ हुई मारपीट की घटना ने मामले को और गंभीर बना दिया है। इस घटना के बाद ग्रामीणों में भारी रोष है और वे दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्हें न्याय चाहिए और दोषियों की जल्द गिरफ्तारी होनी चाहिए।


प्रमुख मांगें

  • मारपीट में शामिल आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई
  • थारू जनजाति के साथ हो रहे दुर्व्यवहार पर तत्काल रोक
  • वन विभाग में भ्रष्टाचार की उच्च स्तरीय जांच
  • निर्दोष लोगों पर दर्ज झूठे मामलों को वापस लिया जाए

प्रशासन के लिए बढ़ी चुनौती

ग्रामीणों ने साफ कहा है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।

इस बीच, एसडीओ संचिता वर्मा की अनुपस्थिति में खटीमा के वन अधिकारी मीडिया से दूरी बनाते नजर आए, जिससे संदेह और गहरा गया है।


आगे क्या?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर पाएगा और दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर मामला यूं ही दबा दिया जाएगा।

खटीमा की यह स्थिति जनजातीय अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।

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