जसपुर में उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन द्वारा हीरा गार्डन में ब्लॉक स्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में आशा वर्कर्स को राज्य कर्मचारी का दर्जा देने और उनके श्रम के शोषण पर रोक लगाने की मांग जोर-शोर से उठाई गई। साथ ही, कार्यक्रम के दौरान ब्लॉक स्तरीय कमेटी का गठन भी किया गया।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए यूनियन की जिला उप सचिव अनीता अन्ना ने कहा कि देशभर में लाखों महिला स्कीम वर्कर्स सरकारी योजनाओं में काम कर रही हैं, लेकिन उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार लगातार आशा वर्कर्स का शोषण कर रही है।
उन्होंने बताया कि प्रदेश में 12,000 से अधिक आशा वर्कर्स कार्यरत हैं, जिन पर लगातार नए-नए कामों का बोझ डाला जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की कमजोर व्यवस्था का खामियाजा भी आशा वर्कर्स को ही भुगतना पड़ता है। छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें काम से हटाने जैसी कार्रवाई आम हो गई है, जबकि वे स्वास्थ्य सेवाओं की अहम कड़ी हैं।
अनीता अन्ना ने यह भी कहा कि आशा वर्कर्स के मान-सम्मान का भी ध्यान नहीं रखा जाता। ऐसे में यूनियन और संगठन की ताकत से ही शोषण के खिलाफ आवाज उठाई जा सकती है।
वहीं, यूनियन की प्रदेश उपाध्यक्ष और जिला सचिव रीता कश्यप ने कहा कि ऐक्टू के नेतृत्व में बनी यूनियन ने आशा वर्कर्स की समस्याओं को मजबूती से उठाया है। उन्होंने कहा कि संगठित संघर्ष के जरिए ही राज्य कर्मचारी का दर्जा और न्यूनतम वेतन जैसी मांगें हासिल की जा सकती हैं।
रीता कश्यप ने केंद्र सरकार के नए लेबर कोड्स पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इनमें आशा वर्कर्स को श्रमिक का दर्जा नहीं दिया गया है, जिससे वे न्यूनतम वेतन जैसे अधिकारों से वंचित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि श्रमिकों के हितों की अनदेखी की जा रही है और उनकी आवाज को दबाया जा रहा है।
सम्मेलन में वक्ताओं ने एकजुट होकर आंदोलन को मजबूत करने और सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर भी जोर दिया।
मुख्य मांगें:
- आशा वर्कर्स को राज्य कर्मचारी का दर्जा
- न्यूनतम वेतन की गारंटी
- कार्य के अनुसार उचित मानदेय
- श्रम शोषण पर रोक
यह सम्मेलन आशा वर्कर्स के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसमें संगठन की एकता और संघर्ष को और मजबूत करने का आह्वान किया गया।















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