मंदिरों में सादगीपूर्ण विवाह: संस्कारों की ओर लौटती नई सोच

समाज में बढ़ते दिखावे और अनावश्यक खर्च के बीच अब सादगीपूर्ण विवाह की ओर लौटने की सोच तेज़ी से उभर रही है। इसी विषय पर डी-बाली ग्रुप की डायरेक्टर श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने लोगों को पारंपरिक मूल्यों को अपनाने और कुरीतियों से दूर रहने का संदेश दिया है।

उर्वशी दत्त बाली का मानना है कि आज के समय में विवाह समारोह अपनी मूल भावना से भटकते जा रहे हैं। पहले जहां शादी को एक पवित्र संस्कार माना जाता था, वहीं अब यह महंगे वेन्यू, बड़े आयोजन और दिखावे की प्रतिस्पर्धा में बदलता जा रहा है। उनका कहना है कि यह प्रवृत्ति समाज के लिए चिंताजनक है और इससे बाहर निकलने की आवश्यकता है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि विवाह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन का एक महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसे सादगी, श्रद्धा और पारिवारिक मूल्यों के साथ संपन्न किया जाना चाहिए। उनका सुझाव है कि भारत में मंदिरों में विवाह की परंपरा को फिर से बढ़ावा दिया जाए। मंदिरों का शांत और आध्यात्मिक वातावरण इस पवित्र बंधन के लिए बेहद उपयुक्त होता है।

उर्वशी दत्त बाली के अनुसार, धार्मिक स्थलों पर होने वाले विवाहों में दिखावे की जगह भावनाओं और संस्कारों को महत्व मिलता है। सीमित मेहमानों की उपस्थिति में संपन्न ऐसे विवाह अधिक आत्मीय और यादगार होते हैं। साथ ही, इससे होने वाली आर्थिक बचत को परिवार के भविष्य, बच्चों की शिक्षा या सामाजिक कार्यों में उपयोग किया जा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव तभी संभव है, जब लोग स्वयं दिखावे की होड़ से बाहर निकलकर जिम्मेदारियों और मूल्यों को प्राथमिकता देंगे। विवाह की असली सुंदरता भव्यता में नहीं, बल्कि उसमें निहित भावनाओं और जीवनभर निभाए जाने वाले संकल्प में होती है।

अंत में, उन्होंने समाज से अपील की कि विवाह जैसे पवित्र संस्कार को सरल, सार्थक और प्रेरणादायक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं।

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