प्रदेश में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इस बीच उत्तराखंड ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के उपाध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग की नियमित और संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाना है।
उन्होंने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण कोई नई प्रक्रिया नहीं है। आजादी के बाद वर्ष 1952 में पहले आम चुनाव से पहले भी मतदाता सूची का गहन सत्यापन किया गया था। इसके बाद 1957 और 1962 में भी इसी प्रकार का पुनरीक्षण हुआ। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद वर्ष 2003 में विशेष गहन पुनरीक्षण किया गया था और अब वर्ष 2026 में इसे दोबारा लागू किया गया है।
जोत सिंह बिष्ट ने बताया कि पंचायत, विधानसभा और लोकसभा की मतदाता सूचियों के अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि कई ऐसे लोगों के नाम सूची में बने हुए हैं जो वर्षों पहले गांव छोड़ चुके हैं, दूसरी जगह मतदाता बन चुके हैं या फिर उनका निधन हो चुका है। ऐसे नामों को हटाने का कार्य पूरी पारदर्शिता के साथ किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर और फोन के माध्यम से मतदाताओं से संपर्क कर उनकी जानकारी का सत्यापन कर रहे हैं। एक मतदाता का नाम केवल एक ही निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज हो सकता है, इसलिए दोहरी प्रविष्टियों को हटाया जा रहा है।
बिष्ट ने कहा कि मतदाता सूची के शुद्धिकरण से आगामी चुनाव अधिक निष्पक्ष होंगे और वास्तविक मतदान प्रतिशत भी सामने आएगा। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे किसी भी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान न दें और सत्यापन प्रक्रिया में सहयोग करें।














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