उत्तराखंड के रामनगर वन क्षेत्र से प्रकृति प्रेमियों और वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे रामनगर वन प्रभाग में करीब 12 साल बाद दुर्लभ इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल (Indian Giant Flying Squirrel) देखी गई है। यह दुर्लभ रात्रिचर जीव एक ग्रामीण के घर में पहुंच गया था, जिसके बाद वन विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर उसका सुरक्षित रेस्क्यू किया।
वन्यजीव विशेषज्ञ इस घटना को क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सफल संरक्षण प्रयासों का सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।
ग्रामीण के घर पहुंची दुर्लभ उड़ने वाली गिलहरी
रामनगर वन प्रभाग की कोसी रेंज के अंतर्गत टेड़ा गांव में उस समय लोगों की भीड़ जुट गई, जब एक बड़े आकार की अनोखी गिलहरी एक ग्रामीण के घर में दिखाई दी। सामान्य गिलहरी से बिल्कुल अलग दिखने के कारण ग्रामीण हैरान रह गए और तुरंत वन विभाग को सूचना दी।
सूचना मिलते ही वन विभाग की रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और सावधानीपूर्वक इस दुर्लभ वन्यजीव का सफलतापूर्वक रेस्क्यू किया।
क्या सचमुच उड़ती है यह गिलहरी?
वन विभाग की जांच में पुष्टि हुई कि यह इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल है, जिसे आम भाषा में “उड़ने वाली गिलहरी” कहा जाता है।
हालांकि यह पक्षियों की तरह उड़ान नहीं भरती। इसके आगे और पीछे के पैरों के बीच पेटागियम (Patagium) नामक त्वचा की झिल्ली होती है, जिसकी मदद से यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक लगभग 60 से 80 मीटर तक हवा में ग्लाइड कर सकती है। यही इसकी सबसे खास और अनोखी विशेषता है।
12 साल बाद दर्ज हुई मौजूदगी
वन विभाग के अनुसार रामनगर क्षेत्र में इस दुर्लभ प्रजाति की अंतिम रिकॉर्डिंग वर्ष 2014 में हुई थी। अब करीब 12 साल बाद इसका दोबारा दिखाई देना इस बात का संकेत है कि क्षेत्र के जंगल अब भी दुर्लभ वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवास बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना वन्यजीव संरक्षण की दिशा में सकारात्मक उपलब्धि है और क्षेत्र की जैव विविधता की मजबूती को दर्शाती है।
उत्तराखंड के इन इलाकों में भी मिलती है यह दुर्लभ प्रजाति
वन्यजीव विशेषज्ञ संजय छिम्वाल के अनुसार इस प्रजाति को मलाबार जायंट फ्लाइंग स्क्विरल के नाम से भी जाना जाता है। यह पश्चिमी घाट के मलाबार क्षेत्र के अलावा उत्तराखंड के कई घने जंगलों में भी पाई जाती है।
उत्तराखंड में इसके दर्शन मुख्य रूप से:
- रानीखेत
- लैंसडाउन
- पिथौरागढ़
- चकराता
- मसूरी
जैसे क्षेत्रों में होते हैं। वहीं रामनगर और कॉर्बेट की शिवालिक तलहटी में इसका दोबारा मिलना बेहद दुर्लभ और महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
स्वास्थ्य परीक्षण के बाद प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाएगा
वन विभाग ने बताया कि रेस्क्यू के बाद गिलहरी का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया है। पूरी तरह स्वस्थ पाए जाने पर इसे जल्द ही उसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ दिया जाएगा। साथ ही इस महत्वपूर्ण रिकॉर्ड को विभागीय दस्तावेजों में भी दर्ज किया जाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस दुर्लभ प्रजाति की वापसी यह साबित करती है कि रामनगर के जंगल आज भी कई अनमोल और कम दिखाई देने वाले वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आश्रय बने हुए हैं।
















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