चमोली में कूड़ेदान बने ‘सफेद हाथी’, बदबू और अव्यवस्था से ग्रामीण परेशान; अधिकारियों के दावों पर उठे सवाल

चमोली: स्वच्छ भारत मिशन के तहत चमोली जिले की ग्राम पंचायतों में लाखों रुपये की लागत से बनाए गए कूड़ेदान अब ग्रामीणों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। गांवों से नियमित रूप से कचरा नहीं उठाए जाने के कारण अधिकांश कूड़ेदान कचरे से लबालब भरे हुए हैं। सड़ते कचरे से उठने वाली बदबू, मक्खियों का बढ़ता प्रकोप और बंदरों द्वारा कचरा सड़कों पर फैलाए जाने से लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि कूड़ेदानों के आसपास से गुजरना भी मुश्किल हो गया है। कई स्थानों पर स्कूली बच्चों को नाक पर रुमाल रखकर स्कूल जाना पड़ता है। लोगों का आरोप है कि स्वच्छता के लिए बनाई गई व्यवस्था अब बीमारी फैलाने का कारण बन रही है।

नौ ब्लॉकों में वाहन और मशीनें, फिर भी नहीं उठ रहा कचरा

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत मिशन योजना के तहत चमोली जिले के सभी नौ विकासखंडों में ठोस कचरा प्रबंधन की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक ब्लॉक मुख्यालय पर कूड़ा वाहन उपलब्ध कराए गए हैं, जबकि नारायणबगड़ के पंती स्थित सेग्रिगेशन सेंटर में कॉम्पेक्टर मशीन भी स्थापित की गई है।

योजना के अनुसार ग्राम पंचायतों से सूखा और ठोस कचरा एकत्र कर सेग्रिगेशन सेंटर तक पहुंचाया जाना था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि गांवों से नियमित रूप से कचरा उठाने की व्यवस्था लगभग ठप है। परिणामस्वरूप कूड़ेदान भर चुके हैं और उनमें सड़ रहा कचरा आसपास के वातावरण को दूषित कर रहा है।

बंदर फैला रहे कचरा, बढ़ रही परेशानी

कूड़ेदानों में जमा कचरा बंदरों के लिए भी आसान निशाना बन गया है। बंदर कूड़ेदानों से कचरा निकालकर सड़कों और रास्तों पर फैला रहे हैं, जिससे बदबू के साथ-साथ लोगों को आवागमन में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

CDO बोले- रोस्टर के अनुसार उठ रहा कूड़ा

मुख्य विकास अधिकारी (CDO) डॉ. अभिषेक त्रिपाठी का कहना है कि जिले के सभी नौ ब्लॉकों में कॉम्पेक्टर मशीनें संचालित हैं और जिला पंचायत के माध्यम से कचरा एकत्र करने की व्यवस्था बनाई गई है। उन्होंने बताया कि कूड़ा उठाने के लिए रोस्टर तय किया गया है और शिकायत मिलने पर संबंधित स्थान पर टीम भेजी जाती है। यदि कहीं लापरवाही मिलती है तो कार्रवाई भी की जाती है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि सूखे कचरे, विशेषकर प्लास्टिक और बोतलों को अलग एकत्र करें और कूड़ा वाहन आने पर उसे सौंपें, ताकि वैज्ञानिक तरीके से उसका निस्तारण किया जा सके।

DPRO ने मानी व्यवस्था की कमजोरी

दूसरी ओर जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) रमेश चंद्र त्रिपाठी ने स्वीकार किया कि ग्राम पंचायत और जिला पंचायत के बीच क्षेत्र पंचायत स्तर की व्यवस्था पूरी तरह सुचारू नहीं चल पा रही है।

उन्होंने बताया कि जिला पंचायत की बैठक में यह मुद्दा गंभीरता से उठा था। अब सभी खंड विकास अधिकारियों (BDO) की बैठक बुलाकर कूड़ा वाहनों का रोस्टर तय किया जाएगा और व्यापक प्रचार-प्रसार के माध्यम से व्यवस्था को सक्रिय किया जाएगा। उन्होंने यह भी माना कि इस कार्य में पहले ही काफी देरी हो चुकी है।

BDO ने गिनाईं जमीनी चुनौतियां

खंड विकास अधिकारी बीरेंद्र सिंह असवाल ने बताया कि कई स्थानों से कूड़ा उठाया गया है, लेकिन ग्राम पंचायत स्तर पर डंपिंग यार्ड की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण परेशानी आ रही है। इसके अलावा नगर पंचायत थराली के डंपिंग ग्राउंड में मजदूरों की कमी के चलते वहां भी कचरा स्वीकार नहीं किया जा रहा है, जिससे पूरी व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

ग्रामीणों के सवाल बरकरार

ग्रामीणों का कहना है कि जब ब्लॉक मुख्यालयों पर कूड़ा वाहन मौजूद हैं और सेग्रिगेशन सेंटर में कॉम्पेक्टर मशीनें भी लगी हैं, तो गांवों का कचरा समय पर वहां क्यों नहीं पहुंच रहा? उनका आरोप है कि कई वाहन ब्लॉक मुख्यालयों में खड़े-खड़े जंग खा रहे हैं, जबकि गांवों में कूड़ेदान ओवरफ्लो हो चुके हैं।

अब सवाल यह है कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनाई गई व्यवस्थाएं आखिर जमीन पर प्रभावी ढंग से कब लागू होंगी और ग्रामीणों को इस समस्या से कब राहत मिलेगी।

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