उत्तराखंड की संस्कृति, पर्यावरण और हरियाली का लोकपर्व, जानिए इसका महत्व

उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल सहित पूरे प्रदेश में प्रकृति और हरियाली के प्रतीक हरेला पर्व को पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। यह लोकपर्व केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, कृषि संस्कृति और सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण पर्व भी है।

इस अवसर पर वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. ललित तिवारी ने हरेला पर्व के सांस्कृतिक, धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हरेला उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति का ऐसा पर्व है, जो प्रकृति के प्रति प्रेम, हरियाली और सतत विकास की भावना को मजबूत करता है।

हरेला का अर्थ है हरियाली और प्रकृति का उत्सव

डॉ. तिवारी के अनुसार, ‘हरेला’ का शाब्दिक अर्थ ‘हरे रंग का दिन’ या हरियाली का प्रतीक है। यह पर्व मानसून के आगमन, कृषि कार्यों की शुरुआत और प्रकृति के नए जीवन का संदेश देता है। हरेला लोगों को पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने बताया कि हरेला पर्व के दौरान मिट्टी की एक टोकरी में पांच या सात प्रकार के अनाज—जौ, गेहूं, मक्का, उड़द, गहत, भट्ट, धान और सरसों आदि—बोए जाते हैं। लगभग नौ-दस दिनों में जब ये अंकुरित होकर हरे-भरे हो जाते हैं, तब इन्हें काटकर सबसे पहले कुलदेवता को अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के बुजुर्ग इन्हें बच्चों और परिवार के सदस्यों के सिर पर रखकर दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं।

वर्ष में तीन बार मनाया जाता है हरेला

डॉ. तिवारी ने बताया कि हरेला पर्व वर्ष में तीन बार मनाया जाता है।

  • चैत्र हरेला – गर्मी के आगमन का संकेत देता है।
  • श्रावण हरेला – वर्षा ऋतु और कृषि कार्यों की शुरुआत का प्रतीक है तथा सबसे अधिक सामाजिक महत्व रखता है।
  • आश्विन हरेला – शीत ऋतु के आगमन का संकेत माना जाता है।

इन तीनों पर्वों के माध्यम से प्रकृति के बदलते मौसम और कृषि चक्र का सम्मान किया जाता है।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है हरेला

डॉ. ललित तिवारी ने कहा कि हरेला केवल परंपरा नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण का जनआंदोलन भी है। इस अवसर पर पौधारोपण किया जाता है, जिससे जंगलों का विस्तार, मिट्टी का संरक्षण, जल संरक्षण और भूजल स्तर बढ़ाने में मदद मिलती है।

उन्होंने कहा कि यदि प्रकृति स्वस्थ रहेगी तो मानव जीवन भी सुरक्षित रहेगा। पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए हरेला आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और हरित पर्यावरण का संकल्प भी है।

हरेला से जुड़ी धार्मिक मान्यता

डॉ. तिवारी ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन के प्रथम दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। एक प्राचीन कथा के अनुसार, जब धरती पर भीषण सूखा पड़ा, तब लोगों ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिवजी के प्रसन्न होने पर वर्षा हुई और धरती फिर से हरी-भरी हो गई। इसी घटना की स्मृति में हरेला पर्व मनाया जाता है।

लोक परंपरा के अनुसार लोग भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मिट्टी की प्रतिमाएं, जिन्हें ‘डीकारे’ कहा जाता है, बनाकर अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

हरेला का पारंपरिक आशीर्वाद

हरेला काटने के बाद बड़े-बुजुर्ग बच्चों और परिवार के सदस्यों को हरेला सिर पर रखकर पारंपरिक आशीर्वाद देते हैं—

“जी रया, जागि रया।
दूबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो।
स्यालक जस वन त्राण हैजो।
हिमालय में ह्यूं छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया।”

इसका भावार्थ है कि जीवन लंबा हो, परिवार समृद्ध हो, जड़ें मजबूत हों और प्रकृति के साथ यह परंपरा सदैव जीवित रहे।

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